
जयपुर। अरावली की पहाड़ियों के बीच शान से खड़े आमेर दुर्ग की ऐतिहासिक विरासत में शिला माता मंदिर आस्था का ऐसा केंद्र है, जहां भक्तों की श्रद्धा सदियों से अटूट बनी हुई है। जयपुर के पूर्व राजपरिवार की आराध्य देवी शिला माता के दरबार में शारदीय नवरात्र के दौरान विशेष धार्मिक उल्लास देखने को मिलता है। मां के दर्शन और आशीर्वाद की कामना लेकर बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। इतिहास, लोक आस्था और राजस्थानी संस्कृति का अनूठा संगम यह मंदिर न केवल जयपुर की धार्मिक पहचान है, बल्कि आमेर की गौरवशाली परंपरा का भी जीवंत प्रतीक है।
राजस्थान की राजधानी जयपुर से सटे ऐतिहासिक आमेर दुर्ग में स्थित शिला माता मंदिर आस्था, इतिहास और राजस्थानी संस्कृति का प्रमुख केंद्र है। मां दुर्गा के स्वरूप शिला माता को जयपुर के पूर्व राजपरिवार की आराध्य देवी माना जाता है। शारदीय नवरात्र और चैत्र नवरात्र के दौरान यहां विशेष पूजा-अर्चना होती है तथा बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मंदिर में विराजमान माता की प्रतिमा के प्रति भक्तों की गहरी आस्था है और इसे आमेर की धार्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
शिला माता मंदिर का इतिहास आमेर के शासक राजा मानसिंह प्रथम से जुड़ा माना जाता है। प्रचलित मान्यता के अनुसार, राजा मानसिंह बंगाल अभियान के दौरान मां काली की प्रतिमा लेकर आए थे। इसके बाद आमेर में माता की स्थापना की गई। मंदिर की प्रतिमा शिला पर उकेरी गई मानी जाती है, इसी कारण देवी का नाम शिला माता पड़ा। मंदिर से जुड़ी ऐतिहासिक परंपराएं आज भी श्रद्धालुओं के बीच विशेष महत्व रखती हैं।
नवरात्र के दौरान शिला माता मंदिर में दर्शन का विशेष महत्व माना जाता है। इस अवसर पर मंदिर में पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए श्रद्धालु पहुंचते हैं। माता के दर्शन के साथ भक्त आमेर दुर्ग की ऐतिहासिक विरासत से भी रूबरू होते हैं। मंदिर की धार्मिक महत्ता और इससे जुड़ी लोकमान्यताएं इसे जयपुर के प्रमुख आस्था स्थलों में स्थान दिलाती हैं।
शिला माता मंदिर केवल पूजा का स्थल नहीं, बल्कि आमेर के गौरवशाली अतीत और राजस्थानी परंपराओं का प्रतीक भी है। सदियों से चली आ रही श्रद्धा के कारण यह मंदिर आज भी देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करता है।




