
जयपुर। राजस्थान में पंचायत चुनाव कांग्रेस के लिए गांवों की चौधराहट हासिल करने से कहीं बड़ा सियासी इम्तिहान बनने जा रहे हैं। मुकाबला भाजपा से है, लेकिन कांग्रेस की असली चुनौती अपने घर के सियासी समीकरण साधने की है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का अनुभव, प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा की संगठन पर पकड़ और पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट की राजनीतिक भूमिका—तीनों के बीच तालमेल चुनावी रणनीति की दिशा तय करने वाला अहम पहलू होगा। टिकट वितरण में किसकी चलेगी, स्थानीय नेताओं की नाराजगी कैसे दूर होगी और गुटीय मतभेदों के बीच कार्यकर्ता कितनी एकजुटता से मैदान में उतरेंगे? यही वे सवाल हैं, जिनके जवाब पंचायत चुनाव में कांग्रेस की संगठनात्मक ताकत की तस्वीर सामने रखेंगे।
राजस्थान में पंचायत चुनाव कांग्रेस के लिए सिर्फ गांवों की सत्ता हासिल करने की लड़ाई नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर नेतृत्व, वर्चस्व और एकजुटता की परीक्षा भी हैं। हालिया निकाय चुनावों के बाद टिकट वितरण, गुटबाजी और संगठनात्मक फैसलों को लेकर उठे सवालों ने इस चुनौती को और गंभीर बना दिया है।हालाकि पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत गोविन्द डोटासरा और सचिन पायलट की मौजूदगी में विगत दिनों मीडिया से बातचीत करते हुए दावा किया कि हम सब एक है , आगामी विधान सभा चुनाव में कांग्रेस बहुमत के साथ सरकार बनाने का दावा किया था ।
पंचायत चुनाव कांग्रेस के लिए सिर्फ गांवों की सत्ता हासिल करने की लड़ाई नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर नेतृत्व, वर्चस्व और एकजुटता की परीक्षा भी हैं। हालिया निकाय चुनावों के बाद टिकट वितरण, गुटबाजी और संगठनात्मक फैसलों को लेकर उठे सवालों ने इस चुनौती को और गंभीर बना दिया है।पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का अनुभव और ग्रामीण राजनीति में उनकी पकड़ कांग्रेस के लिए अहम साबित हो सकती है। गहलोत ने किसानों के मुद्दों पर भाजपा सरकार को घेरते हुए पंचायत चुनाव में सत्तारूढ़ दल को चुनौती देने के संकेत दिए हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या उनका राजनीतिक अनुभव पार्टी के सभी गुटों को एक मंच पर ला पाएगा?
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के सामने संगठन को एकजुट रखने और उम्मीदवारों के चयन में संतुलन साधने की चुनौती है। निकाय चुनावों के दौरान टिकट वितरण और कथित क्रॉस-वोटिंग को लेकर उठे विवादों ने संगठनात्मक अनुशासन पर सवाल खड़े किए हैं। पंचायत चुनाव में स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करना उनके नेतृत्व की बड़ी परीक्षा होगी। वहीं, पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट की भूमिका भी निर्णायक हो सकती है। युवाओं और नए राजनीतिक चेहरों के बीच उनकी लोकप्रियता पार्टी को मजबूती दे सकती है। हालांकि, इसका लाभ तभी मिलेगा, जब पायलट समर्थकों और अन्य गुटों के बीच बेहतर तालमेल बने और चुनावी रणनीति व्यक्तिगत वर्चस्व की लड़ाई में न उलझे।
पंचायत चुनाव में गांवों की सड़क, पानी, बिजली, किसानों की समस्याएं और स्थानीय विकास जैसे मुद्दे निर्णायक रहेंगे। यदि कांग्रेस टिकट वितरण में असंतोष और आपसी खींचतान पर काबू नहीं पा सकी, तो भाजपा को इसका राजनीतिक लाभ मिल सकता है।पंचायत चुनाव का असली सवाल यही है कि गहलोत का अनुभव, डोटासरा का संगठन और पायलट की जनअपील एक साझा रणनीति में बदल पाते हैं या नहीं। कांग्रेस के लिए चुनौती भाजपा से मुकाबले की तो है ही, उससे पहले अपने भीतर भरोसा कायम करने की भी है।




